तन्हाई

आज फिर से मदहोश पड़ा हूँ मैं

बिना खुशबू ये हवा फिर से लौट आई है

मेरी “सांस”, मेरे पास चली आओ अभी

जैसे ये याद चली आई है

दिल बेचैन मेरा तुम्हें देखने को है

दूर होकर भी तू मेरी “परछाई” है

खुद से बेगाना हूँ ,है अब ये भी होश नहीं

ये मैं ही हूँ या मुझमें तू समायी है

तेरे ख्यालों मैं डूबा ,मैं भूल दुनिया को

वफ़ा तू ही बस , दुनिया ये बेवफाई है ,

मेरा कोई नहीं ,अब तो आ जा ,तुझ बिन

अकेला मैं हूँ ,बस बोझिल तन्हाई है

कितनी बोझिल ये तन्हाई है……

Posted in Uncategorized | Leave a comment

बस मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं ..

मैं जब भी कोई गीत लिखूं

बस मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं

मैं सुर और तुम संगीत लिखूं,

बस मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं

हर भाव प्रस्फुटित तुमसे है

मेरी सोच तुम्ही से आच्छादित

मैं तुम बिन क्या मनमीत लिखूं ?

बस मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं

लोभ ,दिखावा ,आडम्बर

किंचित भी न तुमको छु पाए

तुम कान्हा मैं नवनीत लिखूं

मेरे मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं

तुम ही जब मेरी दुनिया हो

फिर मुझे किसी से क्या मतलब ?

क्या इस दुनियां की रीत लिखूं?

बस मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं

बस प्रेम जगत में सच्चा है

बाकी सब नश्वर , मिथ्या है

सोचा क्या हार और जीत लिखूं ?

बस मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं

ये कलम बने साधन मेरा

मैं लीन तुम्ही में हो जाऊं

इसलिए तुम्हारी प्रीत लिखूं

मेरे मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं

मैं जब भी कोई गीत लिखूं

मेरे मीत तुम्हारी प्रीत लिखूं ..

Posted in Uncategorized | Leave a comment

प्रेम

यथार्थ कहना है तो प्रेम कहो

बाकी सब मिथ्या है

अकारण है

समय की कसौटी पर सदियों से कसा जाता हुआ

वह प्रेम ही है जो अमर है

शाश्वत है

सृष्टि की सर्जना का कारण है

वह प्रेम ही है

जो दस्तूर तोड़ कर

सीमायें लाँघ कर

किसी भी हद के पार जा सकता है

बिना कहे सब बता सकता है

बिना सुने सब सिखा सकता है

नासमझ जानवर को भी

समझा सकता है

प्यार अनसुलझा रहस्य है

तो कभी नितांत एकाकी भी

कभी निशब्द नाद है

तो भगवद्लीन सन्यासी भी

वह प्रेम ही है

जो बंधा नहीं जा सकता

चुराया नहीं जा सकता

ख़रीदा बेचा करवाया नहीं जा सकता

प्यार तो बस हो जाता है

खो जाता है इसमें ही ,इसमें जो खो जाता है

कभी प्यार में खोकर तो देखो

कभी किसी का होकर तो देखो

एक बार किसी का होकर देखो ….

Posted in Uncategorized | Leave a comment

प्यार में …..

हे प्राणप्रिये, तुम मधु घन बन ,रोमांचित करती जाती हो ,
मेरे सपनो में सेंध लगा, फिर मेरा ह्रदय चुराती हो |

आई थीं उर में ऐसे तुम ,जैसे पृथ्वी पर चन्द्रकिरण ,
मनचाही दुआ मिली जैसे ,मन आनंदित कर जाती हो |

सारी बातें सुनकर ,कह कर सब हाल,समीप किया तुमने ,
जब सब कुछ अब बेपर्दा है ,तो मुझ से क्यों शर्माती हो ?

दुनिया कहती पागल मुझको, फिर तुमने गले लगाया क्यूँ?
इस मनमौजी मतवाले पर ,क्यूँ इतना प्यार जताती हो?

दुःख देख मेरा बस थोड़ा सा ,देखा है कितना रोती हो ,
और मुस्काने से क्यों जैसे, सारी दुनिया पा जाती हो ?

मीठी सी वो तकरारें , फिर झूठ मूठ रूठ जाना ,
चाहता तुम्हे कितना हूँ मैं, क्या यह अंदाज़ लगाती हो ?

रूठी थीं मझसे जैसे तुम ,है ख्वाब मेरा रूठूं मैं भी
बेबस हूँ रूठ नहीं पाता, तुम ऐसा क्या कर जाती हो ?

तुम अच्छी तुम कितनी प्यारी ,अंदाज़ लगता जाता हूँ ,
बनकर उस से भी अच्छी ,तुम हर बार मुझे झुठलाती हो |

कोई तो बात हुई ही है, बस! आज पड़ेगा बतलाना ,
छिप कैसे सकते हैं मुझसे , जो आंसू खूब छिपाती हो |

मत कहो नहीं सुन सकता मैं, कि तुमको जाना ही होगा ,
विश्वास नहीं होता कैसे इतनी निष्ठुर बन जाती हो |

है कैसा मिलन-बिछरना यह ,जो दर्द नहीं देगा बिल्कुल,
अब दर्द कहा कैसे होगा , चेतना लिए तुम जाती हो |

जाओगी, जाते जाते भी ,मुझको कुछ देती जाती हो ,
अदना सा ही ,अल्पज्ञ सही , मुझे कवि बनाये जाती हो……
मुझे कवि बनाये जाती हो ………

…………………………………………………………..-अनुराग

Posted in Uncategorized | Leave a comment

sirf ek baar…….

जा रहे हो?छोड़कर मुझको?
ऐब मेरा किन्तु अब भी समझ न आया है मुझको
क्यों किया था फिर सुवासित इस ह्रदय को ?
इत्र क्यों सानिध्य का तुमने उड़ेला था ?
कल्पनाओं की लहर पर वो निर्बाध ज्वार भाटे
…कर दिया क्यूँ पर्वतों सम, भावनाओ से, प्रणय को?
रोक लो पग, कुचलते हैं चेतना ,पागल करोगे ?
विरह व्याकुल वेदना को कहाँ तक घायल करोगे?
अच्छा एक बार देखो तो !
कानों में तुम्हारे गीतों की लय को
आँखों में रोक रक्खा है समय को
कि तुम लौटोगे प्रियतम
देखकर मेरे अश्रुमोती
सुन लो मेरे अंतर्मन की चीत्कार
लौट आओ
लौट आओ इस बार
सिर्फ एक बार ……
——————————————– अनुराग

Posted in Uncategorized | Leave a comment

Hello world!

Welcome to WordPress.com. This is your first post. Edit or delete it and start blogging!

Posted in Uncategorized | 1 Comment