हे प्राणप्रिये, तुम मधु घन बन ,रोमांचित करती जाती हो ,
मेरे सपनो में सेंध लगा, फिर मेरा ह्रदय चुराती हो |
आई थीं उर में ऐसे तुम ,जैसे पृथ्वी पर चन्द्रकिरण ,
मनचाही दुआ मिली जैसे ,मन आनंदित कर जाती हो |
सारी बातें सुनकर ,कह कर सब हाल,समीप किया तुमने ,
जब सब कुछ अब बेपर्दा है ,तो मुझ से क्यों शर्माती हो ?
दुनिया कहती पागल मुझको, फिर तुमने गले लगाया क्यूँ?
इस मनमौजी मतवाले पर ,क्यूँ इतना प्यार जताती हो?
दुःख देख मेरा बस थोड़ा सा ,देखा है कितना रोती हो ,
और मुस्काने से क्यों जैसे, सारी दुनिया पा जाती हो ?
मीठी सी वो तकरारें , फिर झूठ मूठ रूठ जाना ,
चाहता तुम्हे कितना हूँ मैं, क्या यह अंदाज़ लगाती हो ?
रूठी थीं मझसे जैसे तुम ,है ख्वाब मेरा रूठूं मैं भी
बेबस हूँ रूठ नहीं पाता, तुम ऐसा क्या कर जाती हो ?
तुम अच्छी तुम कितनी प्यारी ,अंदाज़ लगता जाता हूँ ,
बनकर उस से भी अच्छी ,तुम हर बार मुझे झुठलाती हो |
कोई तो बात हुई ही है, बस! आज पड़ेगा बतलाना ,
छिप कैसे सकते हैं मुझसे , जो आंसू खूब छिपाती हो |
मत कहो नहीं सुन सकता मैं, कि तुमको जाना ही होगा ,
विश्वास नहीं होता कैसे इतनी निष्ठुर बन जाती हो |
है कैसा मिलन-बिछरना यह ,जो दर्द नहीं देगा बिल्कुल,
अब दर्द कहा कैसे होगा , चेतना लिए तुम जाती हो |
जाओगी, जाते जाते भी ,मुझको कुछ देती जाती हो ,
अदना सा ही ,अल्पज्ञ सही , मुझे कवि बनाये जाती हो……
मुझे कवि बनाये जाती हो ………
…………………………………………………………..-अनुराग